Friday, January 2, 2026

औपचारिकता के रिश्ते और विश्वास का संकट

 


औपचारिकता के रिश्ते और विश्वास का संकट

यह कहना अब अतिशयोक्ति नहीं रहा कि आज का समाज रिश्तों से नहीं, बल्कि रिश्तों में भरोसे की कमी से पीड़ित है। हमारे चारों ओर संबंधों की संख्या बढ़ी है, पर उनके भीतर की गर्माहट घटती जा रही है। संपर्क सूची लंबी होती जा रही है, लेकिन भरोसे के नाम कम होते जा रहे हैं। यही आज के सामाजिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है।

समाज कभी रिश्तों से बनता था, आज वह नेटवर्क से बन रहा है। रिश्ते अब अनुभव नहीं, बल्कि एक औपचारिक जिम्मेदारी बनते जा रहे हैं। बधाई हो या संवेदना—सब कुछ समय पर, शब्दों में सटीक, पर भावनाओं से लगभग रिक्त। हम हालचाल पूछते हैं, पर उत्तर सुनने का धैर्य नहीं रखते। कैसे हो?” अब एक शिष्टाचार है, संवाद नहीं।

इस औपचारिकता के पीछे सबसे बड़ा कारण है—विश्वास का क्षरण। आज व्यक्ति हर रिश्ते को आशंका की दृष्टि से देखता है। किसी की चूक को परिस्थिति नहीं, बल्कि मंशा से जोड़ दिया जाता है। संवाद से पहले निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं। परिणामस्वरूप रिश्ते सहेजे नहीं जाते, बल्कि बचाव की मुद्रा में जिए जाते हैं।

आधुनिक जीवन-शैली ने इस प्रवृत्ति को और मज़बूत किया है। समय की कमी, प्रतिस्पर्धा का दबाव और व्यक्तिगत लक्ष्य—इन सबने रिश्तों को प्राथमिकता की सूची में नीचे धकेल दिया है। जब समय ही न हो, तो संवाद कहाँ से आएगा? और जब संवाद नहीं होगा, तो विश्वास कैसे बनेगा?

सामाजिक माध्यमों की भूमिका भी इस संदर्भ में विचारणीय है। सोशल मीडिया ने संपर्क को त्वरित बनाया, लेकिन संवाद को सतही। भावनाएँ अब शब्दों से नहीं, प्रतीकों से व्यक्त की जाती हैं। रिश्ते ‘देखे गए’ और ‘रीऐक्ट किए गए’ तक सीमित हो गए हैं। जबकि विश्वास गहराई माँगता है, समय माँगता है, और सबसे अधिक—मानवीय उपस्थिति।

एक और चिंताजनक पक्ष यह है कि रिश्तों को अब लाभ–हानि के तराजू पर तौला जाने लगा है। कौन किस काम आएगा, कौन असुविधा बन सकता है—यह सोच संबंधों को सौदे में बदल देती है। जहाँ उपयोगिता प्रधान हो जाती है, वहाँ निष्ठा और विश्वास टिक नहीं पाते। रिश्ते तब तक ठीक लगते हैं, जब तक वे सुविधाजनक हैं।

क्षमा की संस्कृति का लोप भी रिश्तों में बढ़ती कठोरता का बड़ा कारण है। पहले छोटी-छोटी गलतियाँ रिश्तों को तोड़ने का कारण नहीं बनती थीं। आज एक शब्द, एक चूक, और वर्षों का संबंध समाप्त। यह प्रवृत्ति रिश्तों को सुरक्षित नहीं, बल्कि अस्थायी बनाती है। जहाँ गलती की गुंजाइश नहीं होती, वहाँ इंसान नहीं, केवल मुखौटे टिकते हैं।

यह स्थिति केवल पारिवारिक या मित्रता के संबंधों तक सीमित नहीं है। कार्यस्थल, पड़ोस, सामाजिक संगठन—हर जगह यही औपचारिकता और अविश्वास दिखाई देता है। लोग साथ काम करते हैं, पर साथ खड़े होने से कतराते हैं। सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा ने ले ली है।

समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि रिश्ते नियमों, अनुबंधों या औपचारिकताओं से नहीं चलते। वे चलते हैं विश्वास, धैर्य और संवाद से। औपचारिकता संबंधों की शुरुआत हो सकती है, पर उनकी आत्मा नहीं। जब आत्मा ही अनुपस्थित हो, तो संबंध केवल ढाँचा बनकर रह जाते हैं।

आज आवश्यकता है रिश्तों को फिर से मानवीय बनाने की। इसका अर्थ यह नहीं कि हम आँख मूँदकर भरोसा करें, बल्कि यह कि हर व्यवहार को संदेह की कसौटी पर न कसें। संवाद को प्राथमिकता दें, निर्णय को नहीं। सुनने की आदत डालें, केवल बोलने की नहीं।

रिश्ते बचाने के लिए बड़े शब्दों, बड़े वादों या बड़े मंचों की आवश्यकता नहीं होती। आवश्यकता होती है बड़े दिल की—जो क्षमा कर सके, जो प्रतीक्षा कर सके, जो सामने वाले की चुप्पी को भी समझ सके।

यदि समाज को सशक्त, संवेदनशील और संतुलित बनाना है, तो हमें रिश्तों को औपचारिकता से बाहर निकालकर फिर से विश्वास के धरातल पर लाना होगा। क्योंकि जब रिश्ते केवल औपचारिक रह जाते हैं, तो समाज सुव्यवस्थित तो दिखता है, पर भीतर से खोखला हो जाता है।

आचार्य रमेश सचदेवा
(शिक्षाविद एवं विचारक)

 

Wednesday, December 31, 2025

नववर्ष : औपचारिक शुभकामनाओं से सच्चे संकल्प तक

 


नववर्ष : औपचारिक शुभकामनाओं से सच्चे संकल्प तक

आचार्य रमेश सचदेवा (शिक्षाविद एवं विचारक)
नया साल आते ही संदेशों का सिलसिला शुरू हो जाता है—
            
नए साल में आपके सपने पूरे हों,         
नया साल, नई कहानियाँ,          
हर प्रयास सफलता में बदले
ये शब्द सुंदर हैं, सकारात्मक हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं, या हमारे भीतर सचमुच कुछ बदलते भी हैं?

नववर्ष का अर्थ कैलेंडर बदलना नहीं, नज़रिये का बदलना होना चाहिए। यदि हर साल वही इच्छाएँ, वही वाक्य और वही आदतें दोहराई जाती रहीं, तो नया साल केवल तारीख़ों का फेर बनकर रह जाएगा। संदेश देना या पढ़ना तब तक सार्थक नहीं होता, जब तक वह हमें सोचने, सीखने और बेहतर बनने के लिए प्रेरित न करे।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया को बदलने का बोझ उठाने से पहले, खुद को बदलना सबसे ज़रूरी है। जब हम अपने व्यवहार में थोड़ी विनम्रता, अपने विचारों में थोड़ी सकारात्मकता और अपने कर्मों में थोड़ी जिम्मेदारी जोड़ते हैं, तभी समाज अपने आप बदलने लगता है। बड़ा परिवर्तन छोटे-छोटे संकल्पों से ही जन्म लेता है।

इस नए साल में संकल्प बड़े नहीं, सच्चे हों—         
हम अधिक शिकायत नहीं, अधिक समाधान ढूँढेंगे।            
हम केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के काम भी आएँगे।      
हम निराशा फैलाने के बजाय आशा का कारण बनेंगे।      
और सबसे ज़रूरी—हम शब्दों से ज़्यादा कर्म पर विश्वास करेंगे।

नववर्ष 2026 की सार्थकता इसी में है कि हम बीते वर्ष की परेशानियों को केवल भूलें नहीं, उनसे सीखें। आशीर्वाद केवल आगे बढ़ाएँ नहीं, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारें। जब संदेश औपचारिकता से निकलकर जीवन-शैली बन जाए, तभी नया साल सच में नया बनता है।

आइए, इस नववर्ष पर यह संकल्प लें कि हम दुनिया को बदलने की घोषणा नहीं करेंगे, बल्कि खुद को बेहतर बनाकर बदलाव की शुरुआत करेंगे। यही सच्चा नववर्ष संदेश है—सरल, हार्दिक और सकारात्मक।

 

Thursday, December 25, 2025

अरावली पर्वतमाला पर विस्तृत विचारणीय लेख : अरावली पर्वतमाला जो खड़े-खड़े अपराधी हो गई।

 


अरावली पर्वतमाला जो खड़े-खड़े अपराधी हो गई। 
कम से कम उसे तो छोड़ दिया जाए जो मानवीय अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है

(अरावली पर्वतमाला पर विस्तृत विचारणीय लेख)

द्वारा आचार्य रमेश सचदेवा (शिक्षाविद एवं विचारक)

अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन प्राकृतिक धरोहरों में से एक है। करोड़ों वर्ष पुरानी यह पर्वतमाला केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जीवन-तंत्र की रीढ़ है। इसके बावजूद आज अरावली सबसे अधिक उपेक्षित और शोषित प्राकृतिक संपदा बन चुकी है। प्रश्न यह नहीं है कि खनन से कितना लाभ हो रहा है, प्रश्न यह है कि इस लाभ की कीमत कौन चुका रहा है—और कब तक?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली पर्वतमाला को लेकर दिए गए निर्णय को अंतिम या अपरिवर्तनीय नहीं माना जा सकता, क्योंकि न्यायालय स्वयं अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करता रहा है। केवल 100 मीटर ऊँचाई के आधार पर अरावली की पहचान करना तर्कसंगत नहीं है—100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ भी लावारिस नहीं हो सकतीं। सम्पूर्ण अरावली पर्वतमाला को सुरक्षित और संरक्षित किया जाना चाहिए।

अरावली लगभग 692 किलोमीटर लंबी, करोड़ों वर्ष पुरानी प्राकृतिक धरोहर है, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के पर्यावरण संतुलन की रीढ़ है। यदि इसका विनाश जारी रहा तो दिल्ली-एनसीआर सहित मैदानी क्षेत्रों में भीषण गर्मी, मरुस्थलीकरण और प्रदूषण खतरनाक स्तर तक बढ़ जाएगा। पीएम-10, पीएम-2.5 जैसे प्रदूषक स्थायी रूप से वायु गुणवत्ता को गंभीर श्रेणी में ले जाएंगे।

हरियाणा के भिवानी ज़िले के तोशाम विधानसभा क्षेत्र के एक छोटे-से गाँव का दृश्य सामने आया है। वहाँ हर 100 कदम पर 300 क्रशर मशीनें पहाड़ियों को खोद रही हैं। 120 से अधिक खनन साइट्स हैं, जहाँ हर समय 300 से अधिक डंपर मौजूद रहते हैं। गाँव में लगभग 1200 घर हैं और अधिकांश घरों की दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं या प्लास्टर झड़ चुका है।

क्या खनन की इजाज़त इसलिए दी जा रही है कि पहाड़ियों से बेशकीमती खनिज निकलते हैं और माफिया अमीर होता चला जाए? अरावली पर्वतमाला के प्रत्येक हेक्टेयर में लगभग 20 लाख लीटर भू-जल पुनर्भरण की क्षमता है। सोचिए, जब पानी ही नहीं होगा तो खेती कैसे होगी और पीने के लिए पानी कहाँ से आएगा?

अरावली को काटने-छाँटने से एक दिन ऐसा आएगा कि बनास, लूणी, साहिबी जैसी नदियाँ सूख जाएँगी। तेंदुआ, भेड़िया, सियार जैसे जंगली जानवर और अनेक वनस्पतियाँ भी विलुप्ति के कगार पर पहुँच जाएँगी।

अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की रक्षा कवच है। इसलिए इसके संरक्षण के लिए सभी राज्यों में व्यापक और सशक्त जन-आंदोलन अनिवार्य है।

अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक दीवार का कार्य करती है। यह रेतीली हवाओं को रोकती है, मानसून को दिशा देती है और वर्षा को संभव बनाती है। इसके प्रत्येक हिस्से में भू-जल पुनर्भरण की अद्भुत क्षमता है। जिस दिन यह क्षमता समाप्त हो गई, उस दिन पानी, खेती और जीवन—तीनों संकट में पड़ जाएंगे।

आज अरावली में हो रहा अनियंत्रित खनन केवल पहाड़ों को नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को तोड़ रहा है। पहाड़ियों के कटते ही तापमान बढ़ रहा है, वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच रहा है और जलस्रोत सूखते जा रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और राजस्थान पहले ही भीषण गर्मी और प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। अरावली का क्षरण इस संकट को कई गुना बढ़ा देगा।

यह विडंबना ही है कि विकास की परिभाषा को केवल कंक्रीट, सड़क और खनिज तक सीमित कर दिया गया है। वास्तविक विकास वह है, जो प्रकृति और मानव—दोनों के अस्तित्व को सुरक्षित रखे। यदि विकास के नाम पर जीवन-रक्षक पहाड़ों को ही समाप्त कर दिया गया, तो यह प्रगति नहीं, आत्मघाती भूल होगी।

अरावली केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी है। यह आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। क्या हमें यह अधिकार है कि हम अपने तात्कालिक लाभ के लिए उनके भविष्य को बंधक बना दें? क्या खनिज माफिया का मुनाफा करोड़ों लोगों के जीवन से अधिक मूल्यवान है?

आज आवश्यकता है कि सरकार, न्यायपालिका और समाज—तीनों मिलकर अरावली के संरक्षण के लिए कठोर और ईमानदार कदम उठाएँ। कानून केवल काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर लागू होने चाहिए। साथ ही जन-जागरूकता और जन-आंदोलन भी आवश्यक हैं, ताकि यह संदेश स्पष्ट हो जाए कि प्रकृति के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।

अंततः यही कहना होगा कि विकास की दौड़ में यदि कुछ छोड़ना ही पड़े, तो विलास छोड़िए, लालच छोड़िए—
कम से कम उसे तो छोड़ दिया जाए जो मानवीय अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।  
अरावली को बचाना केवल पहाड़ों को बचाना नहीं, बल्कि जीवन को बचाना है।

Saturday, December 20, 2025

गाना आए या न आए, गाना चाहिए

 


गाना आए या न आए, गाना चाहिए


हमारे समाज में एक अजीब-सा दबाव चुपचाप पनप गया है—

कि जो दिखे, वही बिके।

जो शोर करे, वही सुना जाए।

और जो मंच पर आ जाए, उसे हर हाल में “परफ़ॉर्म” करना ही चाहिए।

यही सोच आज के दौर का नया मंत्र बन गई है—

गाना आए या न आए, गाना चाहिए।

यह पंक्ति केवल संगीत तक सीमित नहीं है।

यह आज की जीवन-शैली, शिक्षा, राजनीति, सोशल मीडिया और यहां तक कि रिश्तों पर भी सटीक बैठती है।

आज सवाल यह नहीं रहा कि आता है या नहीं,

सवाल यह हो गया है कि दिख रहा है या नहीं।

सोशल मीडिया के मंच पर हर कोई कलाकार है।

कोई लिखना नहीं जानता, फिर भी लेखक है।

कोई बोलना नहीं जानता, फिर भी वक्ता है।

कोई सुनना नहीं जानता, फिर भी गुरु है।

भीड़ ताली चाहती है,

और व्यक्ति ताली के लिए स्वयं को ही खो बैठता है।

दुखद यह है कि इस शोर में

वह स्वर दब जाता है जो सच में साधना से निकला होता है।

जो अभ्यास से आया होता है।

जो चुपचाप भीतर पकता है।

आज बच्चे को यह नहीं सिखाया जाता कि

पहले सुर साधो,

पहले शब्द समझो,

पहले विचार को परिपक्व करो।

उसे यह सिखाया जाता है—

“स्टेज पर चढ़ो, बोलो, दिखो, वायरल हो जाओ।”

पर क्या हर आवाज़ गाना होती है?

और क्या हर मंच योग्यता का प्रमाण है?

समाज को यह समझना होगा कि

हर किसी का गाना अलग होता है।

कुछ का स्वर मंच पर खिलता है,

तो कुछ का मौन ही सबसे सुंदर गीत होता है।

यदि हम हर व्यक्ति से ज़बरदस्ती गाना गवाएंगे,

तो न सुर बचेगा,

न संवेदना,

न सच्चाई।

हमें फिर से उस समय की ओर लौटना होगा

जहाँ पहले सीख थी,

फिर प्रस्तुति।

जहाँ पहले तैयारी थी,

फिर तालियाँ।

वरना एक दिन ऐसा आएगा कि

सब गा रहे होंगे,

पर सुनने वाला कोई नहीं होगा।

और तब यह पंक्ति केवल व्यंग्य नहीं,

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाएगी—

गाना आए या न आए, गाना चाहिए।

आचार्य रमेश सचदेवा

(शिक्षाविद एवं विचारक)